राजद्रोह कानून पर ‘सुप्रीम’ सवाल, क्या आजादी के 75 साल बाद भी देश में अंग्रेजों के इस कानून की जरूरत है….?

नईदिल्ली 19 जुलाई। सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के प्रावधानों के इस्तेमाल को निरंतर जारी रखने पर गत गुरुवार को सवाल खड़े किए और कहा कि आजादी के 74 साल बाद भी इस तरह के प्रावधान को बनाए रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की खंडपीठ ने मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस जी वोम्बटकेरे की याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के सबसे बड़े विधि अधिकारी अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124(ए) को कायम रखने के औचित्य पर सवाल खड़े किए।

न्यायमूर्ति रमन ने पूछा कि आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी उपनिवेशकाल के इस कानून की जरूरत है क्या, जिसका इस्तेमाल आजादी की लड़ाई को दबाने के लिए महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा राजद्रोह के मामलों में सजा भी बहुत कम होती है। सीजेआई ने कहा कि इन मामलों में अफसरों की कोई जवाबदेही भी नहीं है। जब सरकार पुराने कानूनों को कानून की किताबों से निकाल रही है, तो इस कानून को हटाने पर विचार क्यों नहीं किया गया। सीजेआई ने कहा कि राजद्रोह का इस्तेमाल बढ़ई को लकड़ी का टुकड़ा काटने के लिए आरी देने जैसा है, जिसका इस्तेमाल वो पूरे जंगल को काटने के लिए करता है।

वेणुगोपाल ने कोर्ट को अवगत कराया कि राजद्रोह की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पहले से ही दूसरी पीठ के पास लंबित है। इसके बाद कोर्ट ने इस याचिका को भी उसके साथ संबद्ध कर दिया। हालांकि उसने केंद्र को नोटिस भी जारी किया। वेणुगोपाल ने कहा कि आईपीसी की धारा 124ए को खत्म यानी रद्द नहीं किया जाना चाहिए, उसकी अहमियत देश की एकता अखंडता के लिए बनी हुई है, इसके उपयोग के लिए गाइडलाइन बना दी जाए ताकि इसकी कानूनी उपयोगिता और उद्देश्य बना रहे। मुख्य न्यायाधीश ने इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी की निरस्त की गई धारा 66ए के तहत मुकदमे जारी रखने जैसी लापरवाही का भी उल्लेख किया।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *